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शल्य पर्व
अध्याय ४
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सञ्जय़ उवाच
त्यक्त्वा तु विविधान्भोगान्प्राप्तानां परमां गतिम् |  ३३   क
अपीदानीं सुय़ुद्धेन गच्छेय़ं सत्सलोकताम् ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति