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सभा पर्व
अध्याय १९
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वैशम्पाय़न उवाच
स्ववीर्यं क्षत्रिय़ाणां च वाह्वोर्धाता न्यवेशय़त् |  ४८   क
तद्दिदृक्षसि चेद्राजन्द्रष्टास्यद्य न संशय़ः ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति