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सभा पर्व
अध्याय १९
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वैशम्पाय़न उवाच
अद्वारेण रिपोर्गेहं द्वारेण सुहृदो गृहम् |  ४९   क
प्रविशन्ति सदा सन्तो द्वारं नो वर्जितं ततः ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति