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वन पर्व
अध्याय १९
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वासुदेव उवाच
त्वं च सूतकुले जातो विनीतः सूतकर्मणि |  १५   क
धर्मज्ञश्चासि वृष्णीनामाहवेष्वपि दारुके ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति