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वन पर्व
अध्याय १९
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वासुदेव उवाच
स जानंश्चरितं कृत्स्नं वृष्णीनां पृतनामुखे |  १६   क
अपय़ानं पुनः सौते मैवं कार्षीः कथञ्चन ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति