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वन पर्व
अध्याय १९
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वासुदेव उवाच
सात्यकिं वलदेवं च ये चान्येऽन्धकवृष्णय़ः |  २८   क
मय़ा स्पर्धन्ति सततं किं नु वक्ष्यामि तानहम् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति