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वन पर्व
अध्याय १९
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वासुदेव उवाच
सौते किं ते व्यवसितं कस्माद्यासि पराङ्मुखः |  ५   क
नैष वृष्णिप्रवीराणामाहवे धर्म उच्यते ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति