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वन पर्व
अध्याय १४७
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हनूमानु उवाच
दृष्टा सा च मय़ा देवी रावणस्य निवेशने |  ३५   क
प्रत्यागतश्चापि पुनर्नाम तत्र प्रकाश्य वै ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति