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विराट पर्व
अध्याय १२
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वैशम्पाय़न उवाच
अज्ञातं च विराटस्य विजित्य वसु धर्मराट् |  ५   क
भ्रातृभ्यः पुरुषव्याघ्रो यथार्हं स्म प्रय़च्छति ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति