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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५४
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उत्तङ्क उवाच
संहरस्व पुनर्देव रूपमक्षय़्यमुत्तमम् |  ८   क
पुनस्त्वां स्वेन रूपेण द्रष्टुमिच्छामि शाश्वतम् ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति