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भीष्म पर्व
अध्याय २८
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श्रीभगवानु उवाच
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन |  ३२   क
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति