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द्रोण पर्व
अध्याय १९
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सञ्जय़ उवाच
पार्षतः शरजालेन क्षिप्रं प्रच्छाद्य दुर्मुखम् |  २९   क
भारद्वाजं शरौघेण महता समवारय़त् ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति