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द्रोण पर्व
अध्याय १९
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सञ्जय़ उवाच
नैव स्वे न परे राजन्नज्ञाय़न्त परस्परम् |  ३४   क
अनुमानेन सञ्ज्ञाभिर्युद्धं तत्समवर्तत ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति