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द्रोण पर्व
अध्याय १९
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सञ्जय़ उवाच
निर्मनुष्याश्च मातङ्गा विनदन्तस्ततस्ततः |  ४७   क
छिन्नाभ्राणीव सम्पेतुः सम्प्रविश्य परस्परम् ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति