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द्रोण पर्व
अध्याय १९
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सञ्जय़ उवाच
क्रौञ्चवद्विनदन्तोऽन्ये नाराचाभिहता गजाः |  ५३   क
परान्स्वांश्चापि मृद्नन्तः परिपेतुर्दिशो दश ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति