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द्रोण पर्व
अध्याय १९
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सञ्जय़ उवाच
रथाश्च रथिभिर्हीना निर्मनुष्याश्च वाजिनः |  ५६   क
हतारोहाश्च मातङ्गा दिशो जग्मुः शरातुराः ||  ५६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति