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अनुशासन पर्व
अध्याय ८०
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व्यास उवाच
पुत्रकामश्च लभते पुत्रं धनमथापि च |  ४३   क
पतिकामा च भर्तारं सर्वकामांश्च मानवः |  ४३   ख
गावस्तुष्टाः प्रय़च्छन्ति सेविता वै न संशय़ः ||  ४३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति