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द्रोण पर्व
अध्याय ७४
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सञ्जय़ उवाच
ज्येष्ठस्य च शिरः काय़ात्क्षुरप्रेण न्यकृन्तत |  २५   क
स पपात हतः पृथ्व्यां वातरुग्ण इव द्रुमः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति