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कर्ण पर्व
अध्याय १९
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सञ्जय़ उवाच
अय़ुध्यन्त महावेगाः परस्परवधैषिणः |  ४८   क
अन्योन्यं समरे जघ्नुर्योधव्रतमनुष्ठिताः |  ४८   ख
न हि ते समरं चक्रुः पृष्ठतो वै कथञ्चन ||  ४८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति