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कर्ण पर्व
अध्याय १९
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सञ्जय़ उवाच
पादातैराहता नागा विवरेषु समन्ततः |  ५४   क
चक्रुरार्तस्वरं घोरं व्यद्रवन्त दिशो दश ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति