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कर्ण पर्व
अध्याय १९
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सञ्जय़ उवाच
नाराचैर्निहतश्चापि निपपात महागजः |  ६१   क
पर्वतस्येव शिखरं वज्रभग्नं महीतले ||  ६१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति