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कर्ण पर्व
अध्याय १९
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सञ्जय़ उवाच
उद्यम्य च भुजावन्यो निक्षिप्य च महीतले |  ६३   क
पदा चोरः समाक्रम्य स्फुरतो व्यहनच्छिरः ||  ६३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति