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भीष्म पर्व
अध्याय १०३
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सञ्जय़ उवाच
भीष्मस्य समरे कर्म चिन्तय़ानास्तु पाण्डवाः |  ७   क
नालभन्त तदा शान्तिं भृशं भीष्मेण पीडिताः ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति