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शान्ति पर्व
अध्याय १७८
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भृगुरु उवाच
वस्तिमूलं गुदं चैव पावकं च समाश्रितः |  ६   क
वहन्मूत्रं पुरीषं चाप्यपानः परिवर्तते ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति