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शल्य पर्व
अध्याय १९
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सञ्जय़ उवाच
तमापतन्तं सहसा तु दृष्ट्वा; पाञ्चालराजं युधि राजसिंहः |  १२   क
तं वै द्विपं प्रेषय़ामास तूर्णं; वधाय़ राजन्द्रुपदात्मजस्य ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति