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शल्य पर्व
अध्याय १९
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सञ्जय़ उवाच
स तं रथं हेमविभूषिताङ्गं; साश्वं ससूतं सहसा विमृद्य |  १७   क
उत्क्षिप्य हस्तेन तदा महाद्विपो; विपोथय़ामास वसुन्धरातले ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति