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शल्य पर्व
अध्याय १९
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सञ्जय़ उवाच
शरैश्च वेगं सहसा निगृह्य; तस्याभितोऽभ्यापततो गजस्य |  १९   क
स सङ्गृहीतो रथिभिर्गजो वै; चचाल तैर्वार्यमाणश्च सङ्ख्ये ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति