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शल्य पर्व
अध्याय १९
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सञ्जय़ उवाच
आस्थाय़ सुमहानागं प्रभिन्नं पर्वतोपमम् |  २   क
दृप्तमैरावतप्रख्यममित्रगणमर्दनम् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति