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शल्य पर्व
अध्याय १९
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सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालराजस्त्वरितस्तु शूरो; गदां प्रगृह्याचलशृङ्गकल्पाम् |  २२   क
असम्भ्रमं भारत शत्रुघाती; जवेन वीरोऽनुससार नागम् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति