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शल्य पर्व
अध्याय १९
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सञ्जय़ उवाच
ततोऽथ नागं धरणीधराभं; मदं स्रवन्तं जलदप्रकाशम् |  २३   क
गदां समाविध्य भृशं जघान; पाञ्चालराजस्य सुतस्तरस्वी ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति