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शल्य पर्व
अध्याय १९
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सञ्जय़ उवाच
स भिन्नकुम्भः सहसा विनद्य; मुखात्प्रभूतं क्षतजं विमुञ्चन् |  २४   क
पपात नागो धरणीधराभः; क्षितिप्रकम्पाच्चलितो यथाद्रिः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति