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महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय २
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युधिष्ठिर उवाच
आत्मनः सदृशं प्राज्ञं नैषोऽमन्यत कञ्चन |  १०   क
तेन दोषेण पतितस्तस्मादेष नृपात्मजः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति