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शल्य पर्व
अध्याय १९
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सञ्जय़ उवाच
सन्द्राव्यमाणं तु वलं परेषां; परीतकल्पं विवभौ समन्तात् |  ७   क
नैवावतस्थे समरे भृशं भय़ा; द्विमर्दमानं तु परस्परं तदा ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति