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शल्य पर्व
अध्याय १९
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सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा च तां वेगवता प्रभग्नां; सर्वे त्वदीय़ा युधि योधमुख्याः |  ९   क
अपूजय़ंस्तत्र नराधिपं तं; दध्मुश्च शङ्खाञ्शशिसंनिकाशान् ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति