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वन पर्व
अध्याय २१७
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मार्कण्डेय़ उवाच
मातॄणां प्रेक्षतीनां च भद्रशाखश्च कौशलः |  ४   क
ततः कुमारपितरं स्कन्दमाहुर्जना भुवि ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति