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द्रोण पर्व
अध्याय २३
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धृतराष्ट्र उवाच
सम्प्रय़ुक्तः किलैवाय़ं दिष्टैर्भवति पूरुषः |  २   क
तस्मिन्नेव तु सर्वार्था दृश्यन्ते वै पृथग्विधाः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति