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वन पर्व
अध्याय १९०
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वैशम्पाय़न उवाच
नैष शक्यस्त्वय़ा मृगो ग्रहीतुं यद्यपि ते रथे युक्तौ वाम्यौ स्यातामिति ||  ४६   क
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति