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सभा पर्व
अध्याय ५३
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शकुनिरु उवाच
योऽन्वेति सङ्ख्यां निकृतौ विधिज्ञ; श्चेष्टास्वखिन्नः कितवोऽक्षजासु |  ४   क
महामतिर्यश्च जानाति द्यूतं; स वै सर्वं सहते प्रक्रिय़ासु ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति