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सभा पर्व
अध्याय ५
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नारद उवाच
व्युत्पन्ने कच्चिदाढ्यस्य दरिद्रस्य च भारत |  ९५   क
अर्थान्न मिथ्या पश्यन्ति तवामात्या हृता धनैः ||  ९५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति