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विराट पर्व
अध्याय ४५
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अश्वत्थामो उवाच
सङ्ग्रामान्सुवहूञ्जित्वा लव्ध्वा च विपुलं धनम् |  २   क
विजित्य च परां भूमिं नाहुः किञ्चन पौरुषम् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति