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वन पर्व
अध्याय १९०
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वामदेव उवाच
छन्दांसि वै मादृशं संवहन्ति; लोकेऽमुष्मिन्पार्थिव यानि सन्ति |  ६२   क
अस्मिंस्तु लोके मम यानमेत; दस्मद्विधानामपरेषां च राजन् ||  ६२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति