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वन पर्व
अध्याय १९०
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मार्कण्डेय़ उवाच
एकं हि मे साय़कं चित्ररूपं; दिग्धं विषेणाहर सङ्गृहीतम् |  ७२   क
येन विद्धो वामदेवः शय़ीत; सन्दश्यमानः श्वभिरार्तरूपः ||  ७२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति