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वन पर्व
अध्याय १९०
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वामदेव उवाच
घोरं व्रतं व्राह्मणस्यैतदाहु; रेतद्राजन्यदिहाजीवमानः |  ६४   क
अय़स्मय़ा घोररूपा महान्तो; वहन्तु त्वां शितशूलाश्चतुर्धा ||  ६४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति