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वन पर्व
अध्याय १९०
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वामदेव उवाच
नानुय़ोगा व्राह्मणानां भवन्ति; वाचा राजन्मनसा कर्मणा वा |  ६६   क
यस्त्वेवं व्रह्म तपसान्वेति विद्वां; स्तेन श्रेष्ठो भवति हि जीवमानः ||  ६६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति