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वन पर्व
अध्याय १९०
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मार्कण्डेय़ उवाच
एवमुक्ते वामदेवेन राज; न्समुत्तस्थू राक्षसा घोररूपाः |  ६७   क
तैः शूलहस्तैर्वध्यमानः स राजा; प्रोवाचेदं वाक्यमुच्चैस्तदानीम् ||  ६७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति