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वन पर्व
अध्याय १९०
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मार्कण्डेय़ उवाच
एवं व्रुवन्नेव स यातुधानै; र्हतो जगामाशु महीं क्षितीशः |  ६९   क
ततो विदित्वा नृपतिं निपातित; मिक्ष्वाकवो वै दलमभ्यषिञ्चन् ||  ६९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति