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वन पर्व
अध्याय १९०
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मार्कण्डेय़ उवाच
विभेषि चेत्त्वमधर्मान्नरेन्द्र; प्रय़च्छ मे शीघ्रमेवाद्य वाम्यौ |  ७१   क
एतच्छ्रुत्वा वामदेवस्य वाक्यं; स पार्थिवः सूतमुवाच रोषात् ||  ७१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति