वन पर्व  अध्याय १९०

मार्कण्डेय़ उवाच

इक्ष्वाकवो हन्त चरामि वः प्रिय़ं; निहन्मीमं विप्रमद्य प्रमथ्य |  ७५   क
आनीय़तामपरस्तिग्मतेजाः; पश्यध्वं मे वीर्यमद्य क्षितीशाः ||  ७५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति