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वन पर्व
अध्याय १९०
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राजो उवाच
इक्ष्वाकवः पश्यत मां गृहीतं; न वै शक्नोम्येष शरं विमोक्तुम् |  ७७   क
न चास्य कर्तुं नाशमभ्युत्सहामि; आय़ुष्मान्वै जीवतु वामदेवः ||  ७७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति