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वन पर्व
अध्याय १९०
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राजपुत्र्यु उवाच
वरं वृणे भगवन्नेकमेव; विमुच्यतां किल्विषादद्य भर्ता |  ८१   क
शिवेन चाध्याहि सपुत्रवान्धवं; वरो वृतो ह्येष मय़ा द्विजाग्र्य ||  ८१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति